विगड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे,
तो झूठ के साए में कितनी रात रहोगे ?
ख़ामोश रहकर भी ज़िम्मेदार तो ठहरोगे,
सच से नाता तोड़ोगे, क्या खुद से भी डरोगे ?
किसी का ग़लत हो, तो कहना ही पड़ता है,
चाहे सामने शमशीर का साया ही क्यों न पड़ता है।
सच बोलना गुनाह नहीं, हौसले की पहचान है,
वो जो डट जाए झूठ के आगे — वही इंसान है।
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